ग्रामीण विकास की राह में रोड़ा बन रहा शिक्षा का व्यवसायीकरण

Opinion

– एडवोकेट सुरेन्द्र सरदाना 

किसी भी देश की संपन्नता उस देश की जनसंख्या के साक्षरता अनुपात पर निर्भर करती है। यद्यपि संपन्नता के लिए साक्षरता के अलावा अनेकों अन्य कारण भी होते हैं, लेकिन यह पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि बिना शिक्षा के किसी देश राज्य या परिवार की प्रगति संभव नहीं है। शिक्षा के बिना मानव पशु के समान है, क्योंकि शिक्षा ही सभ्यता एवं संस्कृति के निर्माण में सहायक होती है और मानव को अन्य प्राणियों की तुलना में श्रेष्ठ बनाती है। शिक्षा के प्रति केंद्र तथा राज्य सरकारों ने ढुलमुल सी नीति अपनाई हुई है। उसी का परिणाम है कि आजकल शहरों में तो क्या, गांवों में भी शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है। यदि आंकड़ों को देखा जाए तो सरकार स्कूलों में केवल निर्धन वर्ग के लोगों के बच्चे ही पढऩे के लिए आते है, क्योंकि निजी शिक्षा संस्थाओं के फीस के रूप में बड़ी-बड़ी रकमें वसूली जाती है, जिन्हें केवल पैसे वाले ही अदा कर पाते है। आज से लगभग 20 वर्ष पूर्व निजी स्कूलों की संख्या आज के मुकाबले न के बराबर थी और वही विद्यार्थी निजी स्कूलों में पढऩे जाया करता था, जिसे शिक्षा के क्षेत्र में नकारा घोषित कर दिया जाता था, लेकिन आज स्थिति बिल्कुल इसके विपरीत है। निजी शिक्षण संस्थाएं कुकरमुत्तों की तरह फैली हुई है। निजी शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के लिए संपन्न वर्ग के बच्चों में एक होड़ सी लगी हुई है। आज अच्छी और उच्च शिक्षा का व्यवसायीकरण हो रहा है। निजी शिक्षण संस्थानों के संचालक मनमर्जी की फीस वसूल कर रहे है। हालांकि हाल ही में माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक फैसले में मनमर्जी की फीस वसूल करने वाले वालों के खिलाफ लगाम कसने के आदेश दिए गए है। आज शिक्षा केवल धनाड्य परिवारों के बच्चों की बपौति बनकर रह गई है, जिसके चले इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे है। आई.ए.एस., आई.पी.एस. तथा अच्य उच्च श्रेणी की परिक्षाओं में गांवों के 10 प्रतिशत विद्यार्थी भी सफल नहीं हो पाते। आज शहरों के संपन्न परिवारों के नवयुवक उच्च सेवाओं में आ रहे है। उन्हें न तो गांव का ज्ञान होता है और न ही गांव के लोगों से किसी प्रकार की हमदर्दी। यह भी गांवों के पिछड़ेपन का एक बहुत बड़ा कारण है, जिसके अंतर्गत अति विशिष्ट लोगों के बच्चों के लिए विशेष विद्यालयों की स्थापना स्वयं सरकार कर रही है, जैसे सैनिक विद्यालय, केंद्रीय विद्यालय आदि। निज में जन साधारण के बच्चों के लिए प्रवेश पानी यदि असंभव नहीं है तो दुर्लभ अवश्य। इस प्रकार के विशेष विद्यालयों की स्थापना हमारे भारतीय संविधान में प्रदत्त मूल अधिकार, जोकि अनुच्छेर (29) तथा (30) में सांस्कृति तथा शिक्षा संबंधि प्राधिकार प्रदान करते है का अतिक्रमण होता है। अनुच्छेद 29(2) के अनुसार नागरिकों को यह अधिकार होगा कि राज्य द्वारा सहायता प्राप्त या राज्य धन से चलने वाले शैक्षणिक संस्था में प्रवेश देने से किसी भी नागरिक को धर्म, जाति या भाषा के आधार पर वंचित नहीं किया जाएगा। इस प्रकार शिक्षा का व्यवसायीकरण बंद होना चाहिए। निजी शिक्षण संस्थाओं की फीस सरकार द्वारा तय की जानी चाहिए तथा इस फीस इतनी हो कि निर्धन वर्ग के बच्चे भी उन शिक्षण संस्थाना में शिक्षा ग्रहण कर सके, क्योंकि भारते देश की अधिकतर आबादी ग्रामीण आंचल में बसती है, जो निर्धन वर्ग में आती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *