जानिए कैसे स्टार बना भेड़ बकरियां चराने वाला

Cinema

Newsofficer.in Desk

सीढ़ीया उन्हें मुबारक हो जिन्हें आसमान तक जाना है,
मेरी मंजिल तो आसमां से भी ऊपर रास्ता खुद बनाना है।
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जी हां दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने न केवल उपरोक्त कथन की भांति अपनी मंजिल पर जाने के लिए किसी सीढ़ी का नहीं ब्लकि अपने दृढ़ संकल्प व ईमानदारी का सहारा लिया है। इन्होंने आपना रास्ता खुद बनाया है और जीवन में सफलता की वो सब चोटियां सर कर ली हैं जो हर किसी के लिए सर कर पाना असंभव है। ऐसे ही एक शूरवीर योद्धे का नाम है ख्याली सहारण जो कॉमेडी की दुनिया में जाना माना नाम हैं। ख्याली के स्टार बनने की कहानी बहुत संघषपूर्ण है। देश-विदेश में आज ख्याली के सैंकड़ों प्रशंसक हैं मगर अधिकतर लोग उनके जीवन के बारे में कुछ नहीं जानते। उनका जीवन यहां बेहद उतार चढ़ाव व संघर्षों से भरा है वहीं प्रेरणादायक भी है।
आप जानकर हैरान होंगे कि ख्याली का संबंध अत्यंत निर्धन परिवार से है जो भेड़ बकरियां चराकर अपना पेट पालता है। मगर उनका सौभाग्य था कि उनका जन्म राजस्थान की उस मिट्टी में हुआ जिसने अनेकों शूरवीर योद्धों को जन्म दिया है। जिस मिट्टी के कण-कण में छिपा है कभी न हार मानने का ज्जबा। तो चलिए जानते है कॉमेडी के स्टार की कहानी उन्हीं की जुबानी।

मामूली वेतन पर नौकरी से शुरूआत
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मैँ अब तक देश के अलावा दुनिया के कुल 22 देशों में हास्य रंग बिखेर चुका हूं। बचपन से ही पढ़ाई में कमजोर था लेकिन गीत संगीत व नाटकों का समय आता तो मैं सबसे आगे खड़ा होता। यही कारण था कि स्कूल स्टाफ व गांव के लोग उन्हें चाहते। परिवार की माली हालत कमजोर होने के बावजूद संघर्ष कर निरंतर अपनी हास्य कला को निखारता रहा। मुझे याद है मैंने सर्वप्रथम 15 वर्ष की आयु में गंगानगर के एक स्वीमिंग पुल में 800रूपये मासिक वेतन पर नौकरी की थी,उसके बाद जेसीटी कपड़ा मिल में भी मामूली वेतन पर नौकरी कर गुजारा किया।

पैसे की नहीं थी चाहत
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पैसे को लेकर शुरू से ही सीरियस नहीं था और न ही ज्यादा पैसा कमाना चाहता था। बस चाहत थी तो चकाचौंध से भरी दुनिया का हिस्सा बनने की। जैसे तैसे 1200 रूपये गुजारा किया और एक दिन अपने सपनों को सच करने के लिए मुंबई की ट्रेन पकड़ ली। 2001 में बच्चों के मनोरंजन का लाफ्टर शो होस्ट करने का मौका मिला बस यही व मौका था जिसके बाद मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। यहां रहते हुए फिल्मी दुनिया की वह चकाचौंध तो मिल गई मगर दिल अभी भी अपने गांव बडोपल (राजस्थान)की माट्टी के लिए धड़क रहा था। धीरे-धीरे ंकॅ रियर रफ्तार पकडऩे लगा और एक के बाद अनेक ऑफर आने लगे। अब तक मेरा नाम बढ़े स्टारों में शामिल हो चुक ा थे। इसके बाद भी रह-रहकर गांव की बदहाली की तस्वीरें आंखों के सामने आती और मुझे पुकारती। मन में गांव के लिए कुछ करने की चाहत पैदा हुई बस यही बात उन्हें गांव में खींच लाई। गांव लौटेने पर सबसे बड़ी खुशी थी मां-बाप का सर गर्व से ऊंचा हो जाना, वो अब एक स्टॉर के मां-बाप थे। उन विरोधियों के भी मुंह बंद हो गये जो कहते थे कि तूं कभी टीवी पर नहीं आ सकता, तेरी शक्ल सूरत तो भेड़-बकरियां चराने वाले ही है।

ट्रस्ट बनाकर की शुरूआत
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सर्वप्रथम गांव में एक ट्रस्ट रजिस्टर करवाया और उसमें अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा दान कर दिया। मेरा पहला लक्ष्य बिजली, पानी से लेकर स्कूल तक कि मूलभूत सुविधाएं गांव में मुहैया करवाना था। धीरे-धीरे सफलता मिली और गांव की सूरत बदलने लगी। आज गांव को देखकर काफी सकून मिलता है क्योंकि आज मेरा गांव देश के विकसित गांवों में गिना जाता है।

साधा जीवन पसंद
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मुझे साधा जीवन जीना पसंद है। गुरूनानक व जंभेश्वर जी की विचारधारा उन्हें सदा मार्गदर्शन करती आई है। इस जीवन में जो शांति व सकून है वह कहीं नहीं मिलता। नेम, फेम मिल जाने का यह अर्थ नहीं कि अपनी जड़ों को भूल जाओ। सादे जीवन के साथ-साथ लोगों की भलाई करो, खासकर उन लोगों की जो निराश हैं जो बेहद निर्धन हैं। मोटीवेशन बाबा बन कर सबको ऊपर उठाना और बराबरी का दर्जा दिलवाना उनका लक्ष्य है।

लोक कला अनमोल है
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लोक कला हमारी सास्कृतिक धरोहर है जो बेहद अनमोल है। जिसे हमारे पूर्वजों ने अपने ख्ूान पसीने से सींचा था। ऐसे में हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आज हम यहां खड़े हैं यह उसी लोक कला कि देन है। कभी भी अपनी जड़ को नहीं भूलना चाहिए अन्यथा नामों निशान मिट जाते हैं। इसलिए हम सभी को निरंतर लुप्त हो रही हमारी महान लोक कला को बचाने के लिए प्रयास करने चाहिए।

फिल्म का बजट अच्छा हो
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तकनीक व प्रतिस्पर्धा के युग में समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा। अच्छी फिल्मों का बजट करोड़ों के हिसाब से होता है। सस्ते बजट की फिल्में दर्शकों को सिनेमा तक लाने में लगभग नाकाम साबित होती हैं। राजस्थानी व हरियाणवी फिल्मी जगत को यह बात समझनी होगी।

चहेते सितारे
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वैसे तो सभी चेहरे उनके खास हैं बचपन में जिन सितारों को पर्दे पर देखता रहा, उनसे बेहद प्रेरणा मिली। अक्षय कुमार के साथ फिल्म सिंग इज किंग में काम करने से नहीं पहचान मिली। बालीवुड की अनेक नामी हस्तियों जैसे सन्नी दयोल, जान इब्राहम के साथ भी काम कर चुक ा हूं। पंजाबी म्यूजिक की दुनिया में जेजी बैंस, मीका, गैरी संधु, बैनी ए, बाबा सहगल, दलेर मेहंदी, गुरदास मान, अशोक मस्ती, दलजीत दोसांज के साथ स्टेज सांझी करने का मान है। पंजाबी फिल्मों में भी इंट्री हो चुकी है बरहाल पेचा लड़ गया व मुख्तियार चढ फिल्म ने से भी काफी प्रशंसा मिली है।

कोई भी छू सकता है ऊंचाईयां
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दो बेटे मानव और रेहान हैं एक अभिनय व दूसरा तकनीकी शिक्षा ग्रहण कर रहा हैं। कोई भी जमीन से उठकर ऊंचाईयां छू सकता है बस उसे पूरे सिस्टम का पता होना चाहिए। हर एक को चाहिए कि किसी भी क्षेत्र में जाने से पहले उसे भलि भांति समझें, विचार करें ओर फिर उस पर काम करें। पैसे देकर फिल्म में रोल करना गलत है, जो रोल देता है वह भी गलत है। सही आर्टिस्ट ही रोल पा सकता है। अच्छी एक्टिंग के माध्यम से वह फिल्मी जगत में अपनी जगह बना सकता है। राज्य सरकार को भी चाहिए कि वे प्रदेशिक स्तर पर टैक्स ना लें या काम करें ताकि नये आर्टिस्ट व प्रोडयूसर भी अच्छी फिल्में बना सके।

संदेश

पाठको व मेरे प्रशंसकों आपसे रिक्वेस्ट है कि फिल्में सिनेमा हाल ही में देखे अथवा ओरिजनल सीडी/डीवीडी खरीदें ताकि फिल्मों को घाटा न हो और अच्छी फिल्में बन सकें। सफलता के उच्च शिखर पर पहुंच कर भी हमें अपनी मिट्टी को नहीं भूलना चाहिए बल्कि उससे जुडा रहकर तन-मन-धन से सेवा करनी चाहिए।

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